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गोवंशों के स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन पर प्रभाव पड़ने की सम्भावना है ऐसी दशा में गोआश्रय स्थलों में संरक्षित निराश्रित गोवंश एवं पशुपालकों द्वारा पाले जा रहे पशुओं के खान-पान व रख-रखाव में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

Jan Dhamaka Times


जनपद जौनपुर | मुख्य पशुचिकित्साधिकारी ने निदेशक, प्रशासन एवं विकास, पशुपालन विभाग, उ०प्र०, लखनऊ के आदेश के क्रम में अवगत कराया  है कि गीष्म ऋतु में जनपद में भीषण गर्मी तथा गर्म हवा व लू के प्रकोप के कारण गोआश्रय स्थलो में संरक्षित निराश्रित/बेसहारा गोवंशों के स्वास्थ्य एवं प्रबन्धन पर प्रभाव पड़ने की सम्भावना है ऐसी दशा में गोआश्रय स्थलों में संरक्षित निराश्रित गोवंश एवं पशुपालकों द्वारा पाले जा रहे पशुओं के खान-पान व रख-रखाव में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। 

जिस पर निम्नानुसार कार्यवाही किया जाना अपेक्षित हैः- गोआश्रय स्थलों में ग्रीष्म ऋतु एवं उ०प्र० राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण के निर्देशानुसार गर्मी व लू के प्रकोप के दृष्टिगत मूलभूत व्यवस्था किये जाने की विस्तृत दिशा निर्देश निर्गत है। गर्म हवाओं तथा लू से बचाव के लिए गोवंश शेड को चारों और से टाट अथवा बोरे से ढका जाय तथा यदि सम्भव हो तो दिन में टाट के परदों को पानी से निगोया जाय, जिससे गर्म हवा क प्रकोप कम से कम हो। पशुओं के पीने हेतु स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था की जाए। निश्चित समयांतराल पर पानी की चरी को चूने अथवा ब्लीचिंग पाऊडर से सफाई की जाए, जिससे उत्पन्न शैवाल के कारण जल प्रदूषित न होने पाए। गर्मी के मौसम में बोये जाने वाले हरे चारे विशेषकर चरी तथा सूडान ग्रास की फसल में पानी के कमी के कारण हाइड्रोसाइनिक एसिड तथा नाइट्राइट विषाक्तता होने की प्रबल सम्भावना रहती है अतः चरी के खेत में समय समय पर पर्याप्त सिंचाई की जाय तथा हरे चारे के जिस खेत में यूरिया की टॉप ड्रेसिंग की गयी हो या यूरिया डाला गया हों उस खेत के हरे चारे का उपयोग सिंचाई उपरान्त कम से कम एक दिन बाद ही खिलाने हेतु किया जाये। पशुओं को मात्र हरा चारा न खिलाया जाए। यह उचित होगा कि पशुओं के आहार में 20 प्रतिशत हरे चारे के साथ 80 प्रतिशत गेहूँ के भूसे को मिलाकर खिलाया जाय, जिससे नाइट्राइट तथा हाइड्रोसाइनिक एसिड की विषाक्तता का प्रभाव न्यूनतम हो। हरे चारे को काटने के उपरान्त एक दिन खेत में छोड़ने के बाद कुट्टी काटकर खिलाने हेतु प्रयोग में लाया जाए। हरे चारे/भूसे से विशिष्ट प्रकार गंघ/ दुर्गंध आने पर, संदिग्ध चारे का प्रयोग करने में सावधानी बरती जाय। समस्त पशु चिकित्साधिकारीगणों द्वारा जनपदों में सूखे से प्रभावित अथवा सिंचाई रहित चरी सेवन से पशुओं सम्भावित सायनाइड प्वाइजनिंग के उपचार हेतु सोडियम थायोसल्फेट तथा खेती में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न कीटनाशक की विषक्तता हेतु विशेष प्रतिकारक की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता सभी पशु चिकित्सालयों पर सुनिश्चित करा ली जाए। गला घोंटू (एच० एस०), लंगड़िया (बी० क्यू०) तथा अन्य  संक्रामक बीमारियों से बचाव टीकाकरण प्राथमिकता पर पशु चिकित्साधिकारियों द्वारा करा लिया जाए। वृद्धावस्था एवं गंभीर बीमारी से गोवंश की मृत्यु होने पर निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शव को 06-07 फीट गहरे गढ्ढे में दफन कर निस्तारित किया जाए। उपरोक्त बिंदुओं के साथ ही स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप मौसमी बीमारियों से बचाव हेतु समुचित जानकारी पशुपालकों को उपलब्ध करायी जाय।


 

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