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“निर्गुण फाग सुधारक जी की "

Jan Dhamaka Times



फागुन मास चित चोरी सखी रे।कइसे खेली हम होरी सखी रे ।l

बिनु पिया ऋतुराज न भावे, आंधी आधी रतियां नींद न आवे ! भरि जोवन आग की गोरी सखीरे ।। कइसे० ।।


विरहा की अग्नि मोहें तड़फावें, गेरा बदन अब श्यामल होई जावें,, अब लाज लगे चहुँ ओरी सखी रे ।। कइसे० ।। 

गुरुज्ञान ग से खेलो होरी, कटे कलेश वासना जब तोरी, जब खुलिहैं विवेक कटोरी सखी रे।। कइसे० ।।

 पाँच धातु जुटाके गोरिया इक पिचकारी बनाओ, चौदह भुअन रंग भीतर भरिके नाना रूप दर्शाई ! तब मिलन से मिलना होईहै तोरी सखी रे ।। कइसे० ।।

" सीखहुँ आज सहूर कइसे" 

सखी कंत की सोच हमेय नहीं, नहिं सोच हमें यहि फागुन के। 

जरजात जिया सुन वान पपीहा के, विनु काष्ठऔ आगुन के ।। वैदेही की सुधि विसार दिया, जाहिं वसे परदेश जबहिं सो।

 लाज शरम उन्हहि नहिं आयों, नहि भेज्यो सन्देश तवहिं सो ।

सिर केस झयों पतझड़ जइसे, हॉ बउराई बउर जइसे ।

अफसोस “सुधारक” की रे सखी सीखहुँ आज सहूर कइसे ।। 

 रचयिताः- राम मिलन गुप्त “सुधारक जी" पुत्र स्व० श्री फेकूराम

249/16 डी ग्राम भड़ौरा, पोस्ट-मल्हनी, जिला-जौनपुर उ०प्र०

सौजन्य सेः- धर्मेन्द्र कुमार यादव (एडवोकेट) आदर्श आनलाईन सेन्टर मल्हनी बाजार, जौनपुर।

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