आपकी तरह हम भी कई बार खुद से पूछ चुके हैं , कि अब उत्सव भी बदरंग क्यों होने लगे हैं ? या उत्सव में घुलने का कोई एक वाजिब तर्क बचा है क्या ? उत्सव और उल्लास तो मन का मान है , जब मन ही उदास रहेगा तो उत्सव कैसे खिल पाएगा । पर प्रकृति ?
किसी योगी के उन्माद से उपजी प्रकृति निर्विकार निर्झर अविरल अपनी यात्रा पूरी करती रहती है । यह आसक्त है , अनासक्त । शिव और कृष्ण भारतीय वांगमय के दो देव चरित्र हैं जो एक ही जीवन में दो काल खंड खड़ा करते हैं - आसक्त और अनासक्त का । कृष्ण आसक्त होता है गोपियों संग चरम तक जाता है , प्रकृति की सबसे जटिल रचना स्त्री को समझने की इतनी बड़ी जुगत समूचे मानवीय संस्कृति में नही मिलती । जब वह गोपियों को पर्दे से बाहर बुलाता है , निर्बस्त्र , बग़ैर किसी आडम्बर के , निश्चल । मनीषी दर्शन दे सके थे - निराकार को आँखों में रख कर दो टूक बातें हुयी हैं । ईसा ने देखा है उस रोशनी को , कोहे तूर से निकले प्रकाशपूँज ने हज़रत मूसा को डगर दिखा दिया , बुद्ध का ईश्वर तो खुद बुद्ध निकला । लेकिन ये सारे फ़लसफ़े उनके अपने थे , उन्होंने उसे बाँटा । चेताया । लेकिन कृष्ण और शिव न बाँटते हैं , न ही चेताते हैं , मन को आकर्षित करते हैं । पूजा पाठ में वह आकर्षण नही है जो लीला में है । एक भय मिटाने का साधन बनता है , लोभ का श्रोत है , कुछ अतिरिक्त लेंने की लालच है लेकिन लीला ? उत्सव का बोध जगाता है । उँगली पर गोवर्धन पहाड़ उठानेवाला चरवाहा कृष्ण इंद्र के भय से मुक्ति देता है वही काला कलूटा “कनू “ मामूली सी बारिस से बचने के लिए अपनी प्रिया राधा के आँचल में चला जाता है और राधा के वक्षस्थल पर उसके भीगे गाल का स्पर्श होता है तो वह कृष्ण आसक्त है । एक दिन वही निठुर कृष्ण अनाशक्त होकर कुरुक्षेत्र में खड़ा होकर अर्जुन के बहाने से दुनिया का सबसे बड़ा संदेश दे जाता है ।
शिव और आगे हैं । भारतीय संस्कृति की दो धुरियाँ हैं । काशी और मथुरा । आज दोनो धुरियाँ उत्सव में हैं । दोनो होली में हैं । आज मथुरा आसक्त है - ब्रज गा रहा है -
ब्रज करे विहार , श्याम राधिका दनो जने ॥
और काशी ? मसान में उत्सव मना रहा है -
“ खेलें मसाने में होली , दिगम्बर , खेलें मसाने में होली ॥
लालशेखर सिंह ब्यूरो
