प्रयागराज के घाटों पर जब मुग़ल अधिकारियों ने ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जी की पालकी को रोकने की धृष्टता की, तब अन्ताजी मानकेश्वर ने अपनी सेना को स्पष्ट आदेश दिया। अन्ताजी के पत्रों के अनुसार:
"आम्ही दिल्लीच्या तख्तासमोर नमलो नाही, तर जगद्गुरुंच्या पालखीचा अपमान कसा खपवून घेणार? पालखी संगमपर्यंत निर्विघ्न जाईल, अन्यथा तलवार बोलेल।"
(अर्थात्: हम दिल्ली के तख्त के सामने नहीं झुके, तो जगद्गुरु की पालकी का अपमान कैसे सहेंगे? पालकी संगम तक निर्विघ्न जाएगी, अन्यथा तलवार बोलेगी।)
मुग़ल अधिकारी, जो कर और प्रोटोकॉल की बात कर रहे थे, मराठा तोपों के सामने बस कुछ क्षण भी खड़े होने का साहस नहीं कर सके। अन्ताजी ने सुनिश्चित किया कि ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य अपनी पूर्ण मर्यादा (पालकी, छत्र, चामर) के साथ संगम के जल तक पहुँचें। यह 'सहज स्नान' सनातन की संप्रभुता की घोषणा थी। (1750-60 के दशक के
इस कालखंड के दौरान जब ज्योतिष्पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी रामकृष्ण तीर्थ जी प्रयाग संगम स्नान के लिए पधारे, तब मुग़ल सूबेदारों ने अपनी कुटिलता से उनकी पालकी को रोकना चाहा। उस समय पेशवा के आदेश पर दत्ताजी शिंदे और मल्हारराव होल्कर ने अपनी सशस्त्र टुकड़ियों को संगम तट पर तैनात कर दिया। मराठा तोपखाने के भय से मुग़ल सैनिक पीछे हट गए और ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जी ने पूर्ण राजकीय वैभव, क्षैतिज-पालकी और छत्र-चामर के साथ संगम में प्रवेश किया। इस प्रसंग को इतिहास में 'सहज स्नान' के नाम से जाना जाता है, जो आज भी ज्योतिष्पीठ की सर्वोच्चता का प्रमाण है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ‘परमाराध्य’ का मर्यादा-रक्षण उसी इतिहास की चेतना का पुनर्जागरण है। सिद्धान्त है कि इतिहास स्वयं को दोहराता है। वर्तमान में, जब प्रशासन ज्योतिष्पीठ की प्राचीन मर्यादाओं और पालकी के प्रोटोकॉल में बाधा डालता है, तब परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानंदः सरस्वती '1008' का अडिग रुख उसी 18वीं शताब्दी की पेशवा कालीन चेतना का जीवंत रूप है। जिस प्रकार अन्ताजी मानकेश्वर ने दिल्ली के दरबार में शास्त्र-मर्यादा के लिए शस्त्र का समर्थन लिया, आज परमाराध्य अपने तप और सत्याग्रह से उसी 'क्षैतिज-पालकी' और 'छत्र-मर्यादा' को जीवंत रख रहे हैं।
यह स्पष्ट है कि ज्योतिष्पीठ की पालकी की रक्षा केवल एक परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि सनातन की संप्रभुता और गरिमा की रक्षा है। मुगलों द्वारा लगाई गई रोक को जिस प्रकार पेशवाओं ने खंडित किया था, आज उसी मर्यादा को अक्षुण्ण रखना प्रत्येक सनातनी का परम धर्म है।
यदि हम इस मर्यादा रक्षा को नहीं उठे तो यह निरूपित रहेगा कि मुगल जिस पालकी की मर्यादा न तोड सके उस पालकी की मर्यादा तथाकथित हिन्दू राज्य में खंडित हुई और सच्चे सनातनियों का पराक्रम प्रसुप्त ही रहा। जो कि एक कलंक होगा।
