सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु विधि हाथ॥
__श्रीरामचरितमानस- अयोध्याकाण्ड दोहा- १७१
व्याख्या- इस दोहे में प्रवेश करने से पहले गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित ग्रंथ में इसका अर्थ देख लेते हैं... “मुनिनाथ ने बिलखकर (दुखी होकर) कहा- हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं।
यह जो अर्थ है, वह शब्दों की स्थूलता में जड़ा अर्थ है, मूढताजन्य अनुवाद है। ऐसे अर्थों के कारण ही श्रीरामचरितमानस का सार लोगों तक नहीं पहुँच पाया है और लोग भगवत्ता को तत्त्व से जाने बिना कथा की स्थूलता में उलझ गए हैं। अनुवाद करनेवाले ने यदि इस दोहे के पीछे-आगे लिखे पर चिंतन किया होता, तो “बिलखि” शब्द का अर्थ “दुखी होकर” कदापि न लिखता। लिखने से पूर्व चिंतन किया जाना चाहिए था कि यह वचन आया किसके मुखारविन्द से है। यह ऋषि वशिष्ठ का वचन है। तुलसी उन्हें “मुनिनाथ” कहते हैं। मुनि का अर्थ है, पूर्ण मौन में प्रतिष्ठित...
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
__श्रीमदभगवदगीता- २.५६
जो है दुखों में क्षोभरहित, सुखों में स्पृहविगत, भयक्रोधरागरहित और रहे सदा स्थिरबुद्धिस्थ, वह मुनि। जरा विचार करें कि क्या इन सब गुणों को धारण करनेवाला दुखी हो सकता है? कदापि नहीं। चिंतन के तल पर “बिलखि” शब्द का अर्थ होगा, विलक्षण दृष्टि से सम्पन्न। मुनि वशिष्ठ महान ऋषि हैं, उनकी दृष्टि विलक्षण है। उन्होंने द्रष्टा की तरह पूरी परिस्थिति को परखा, अविचलित रहते हुए विवेकपूर्ण बुद्धि से विचार किया, तत्पश्चात भरत को समझाया। “भावी” शब्द से तात्पर्य है, भविष्य में होना और “विधि” शब्द से अर्थ है, ईश्वर का विधान अर्थात त्रिगुणसत्ता से संचलित जीवन। यहाँ लाभ-हानि का अर्थ धन-सम्पदादि के नफ़ा-नुक़सान से नहीं है। “जीवन-मरनु” का अर्थ न तो शरीर के ज़िंदा रहने से है और न ही उसके न ज़िंदा रहने से और न ही जसु-अपजसु का अर्थ कीर्ति-अपकीर्ति से है। ये समग्र के क्रियारूपी यंत्र हैं, “विधि हाथ”। त्रिगुण-शक्ति से आप्त समग्र इन यंत्रों से अखिल ब्रह्माण्ड का संचालन करता है। इसे एक वृक्ष के उदाहरण से समझने की चेष्टा करेंगे। सारा चराचर जगत त्रिगुणात्मक प्रकृति से आता है। वृक्ष उसी का अंग है। उसका सारा जीवन लाभ-हानि के द्वंद्व में डोलता है। उसमें नए-नए पत्ते आते हैं, नई-नई डालियाँ आती हैं, नए-नए फल आते हैं। यह सब “लाभ” है। फिर वे ही फल-डाली-पत्ते क्षर हो जाते हैं, झड़ जाते हैं, जीवन खोकर वृक्ष से जुदा हो जाते हैं। यह सब “हानि” है। पुराने का खोना और नए का पाना, यही है हानि-लाभ। यह समग्र अस्तित्व में निरन्तर घट रहा है, हमारे जीवन में भी। थोड़ा गहरे में देखें, तो पाएंगे कि वृक्ष की तरह हम भी हानि-लाभ के द्वंद्व में डोल रहे हैं। हम नया शरीर पाते हैं, उसी शरीर को खो देते हैं, फिर नया शरीर पाते हैं, यही है जीवन-मरण का द्वंद्वात्मक चक्र। न जाने कितने जन्मों से हम इसी चक्र में घूम रहे हैं। यही है “भावी प्रबल”, जिसके ऊपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। या यूँ कहिए कि भूतकाल में जो हुआ, उस पर हमारा कोई नियंत्रण न था और भविष्य में जो कुछ होनेवाला है, वह भी हमारे वश में नहीं हैं।
“भावी” का एक अर्थ और भी है, दर्शनीय, दृश्य के रूप में दिखनेवाला। इसे समझना होगा “विधि” शब्द से, जैसे योग-विधि, लेखा-विधि इत्यादि। त्रिगुण-जगत में हर चीज के होने और न होने के, बनने और बिगड़ने के, सृजन और विनाश के सुनिश्चित तरीके हैं। सृजन की हों या विनाश की, लाभ की हों या हानि की, दृश्य हों या अदृश्य, प्रकृति में सारी घटनाएं क्रमबद्ध तरीके से घटती हैं। उनके अपने-अपने भविष्य हैं, इसलिए “भावी” हैं और उन्हें देखा जा सकता है, इसलिए दर्शनीय हैं। चाँद-सूरज का हर रोज उगना-अस्त होना भावी है, वह दर्शनात्मकरूप से भव्य है। नदियों का पर्वत से बहकर समुद्र में खो जाना और फिर वर्षा के रूप में बादल बनकर पर्वत पर बरसना भावी है, वह भी दर्शनात्मकरूप से भव्य है। ऐसी ही निरन्तर घट रही घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में ईशोपनिषद कहता है कि यदि तुम समस्त सृष्टि के होने में ईश्वर की यशस्विता को; नित्यप्रति जो कुछ घट रहा है, उसमें उनके कर्तृत्व के सौन्दर्य को देख सको, तो जानोगे कि सब कुछ “हा” यद्वा उनकी आश्चर्यमयी विभूतियों के “थ” यद्वा संरक्षण में हो रहा है। यही है “विधि हाथ” का वास्तविक अर्थ।
प्रस्तुति- मदन गोपाल गुप्ता "अकिंचन"



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