लालशेखर सिंह-व्यूरो
महाराष्ट्र मुंबई-गोरेगाँव पश्चिम स्थित बांगुर नगर के लक्ष्मी सरस्वती ग्राउंड पर चंद्रकांत गुप्ता एवं चमेली देवी गुप्ता के पावन संकल्प से प्रेममूर्ति पूज्यश्री प्रेमभूषण महाराज के कृपापात्र पूज्य राजन महाराज के व्यासत्व में रामकथा सेवा समिति मुम्बई द्वारा आयोजित नौ दिवसीय रामकथा महोत्सव में पूज्य राजन महाराज ने अयोध्याकांड के आश्रय में रामकथा गायन करते हुए निवेदित किया कि अयोध्याकांड को तुलसीदास जी ने एकदम व्यवस्थित लिखा है महापुरुषों के अनुसार अयोध्याकांड मनुष्य जीवन की हृदय स्थली है।अयोध्याकांड के प्रारंभ में सर्व प्रथम भगवान शिव की वंदना इसलिए किये कि भगवान शिव अपने परिवार के सदस्यों में व्यवहारिक भिन्नता के बाद भी सदैव शांत और प्रसन्न रहते हैं।तुलसीदास जी द्वितीय वंदना प्रभु राम की करते हैं क्योंकि युवानी काल में जीवन कई झंझावातों से घिरा होता है जैसे भगवान को युवराज पद मिलते मिलते वनवास मिल गया फिर भी ऐसी विषम परिस्थिति में भी भगवान प्रसन्न रहते हैं।अयोध्याकांड मनुष्य को जीवन जीना सिखाता है। जा सकता है।पूज्य राजन महाराज ने भगवान शिव को गुरु मानकर शिवचर्चा करने वालों को पूज्य राजन महाराज ने कहा कि भगवान शिव किसी एक के नही बल्कि त्रैलोक के गुरु हैं, किंतु मनुष्य रूप में इस धरती पर आने वाले हर किसी को गुरु की शरण में जाकर दीक्षालेना अनिर्वाय है।शिव के ही रूप में धरती पर आये आदि गुरु शंकराचार्य को भी गुरु शरण में जाना पड़ा था।पूज्य राजन महाराज ने व्यासपीठ से श्रोताओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि,बिना दीक्षा के भी नाम जप किया जा सकता है और यही नाम जप आप को सद्गुरु से स्वयं मिलवा देगा।भगवान राम के वनवास प्रसंग की चर्चा करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि,माता कैकेयी ने राम जी की इच्छा से चक्रवर्ती जी से दो वरदान लेकर संसार में स्वयं के चरित्र को कलंकित कर लिया।संसार में अज्ञानता पूर्वक किया गया प्रेम ही मोह है।
केवट प्रेम प्रसंग की चर्चा करते हुए पूज्य राजन महाराज ने कहा कि केवट जी जान गये हैं कि,सारा कमाल रामजी के चरण रज में हैँ इसीलिए वे भगवान के चरण रज को पखारना चाहते हैं। केवट जी ने सोचा कि आज तक जो भी आता था वह मुझे नौकर समझ कर आदेश देता था आज रामजी ने निवेदन करके मुझे मालिक बना दिया यह भगवान को छोड़कर कोई और नही कर सकता है। अतः जीवन में जो भी प्राप्त है उसके लिए भगवान को धन्यवाद देना चाहिए। पूज्य राजन महाराज ने कथा प्रसंगों के बीच "कहियव दर्शन दिहै हो भिलनियव के राम","किस धुन में बैठा बावरे","जगत में कोई ना परमानेंट","तोहरे गोड़वा के धुरिया से डर लागेला",पाँव अपना प्रभू जी धुला लीजिये","करुणा निधान रउवा",मुझे तूने मालिक बहुत दे दिया है"जैसे भावपूर्ण भजनों को सुनाकर श्रोताओं मंत्रमुग्ध कर दिया।

